Chapter 1
जगतसुख के ये देवदार
@surbhi

पहाड़ों की ऊँचाइयों पे, लाइन लगाकर खड़े हैं। सीना तान के अपना आसमान को छूते हुए, पूरी फ़िज़ा मदहोश है। इनकी मद्धम-सी ख़ुशबू से, पूरी हवा है ताज़ा और ठंडी। ज़मीन से जुड़े हुए जगतसुख के ये देवदार, मानो कुछ कह रहे हैं। कुछ चाहते हैं ये हमें समझाना। लगते हैं जैसे बोल रहे हैं, क्यों तुम्हें है वापस जाना? अपनी जड़ों से जुड़े हुए, कितनों को इन्होंने दिया है साया। अपनी छाँव से कितने पंथियों को दिया है आराम। इन शाख़ों ने कितने मौसम गुज़रते देखे हैं, वक़्त बदलते हुए देखा है, और कितनी कहानियों के रह चुके हैं ये गवाह। अपनी चुप्पी में भी ये एक ग्रंथ जैसे खुलते हैं। ऐसा लगा मानो इनसे ही सीखना होगा जीवन का सार।
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